व्रत कथा वे पारंपरिक कहानियाँ हैं जो व्रत के साथ सुनाई जाती हैं, और बताती हैं कि व्रत कहाँ से आया और क्यों रखा जाता है। किसी भी कार्ड पर जाकर उसकी आगे की तिथियाँ देखें।

पद्म पुराण के अनुसार मृदुमान्य नामक दैत्य किसी भी शस्त्र से नहीं मारा जा सकता था। भगवान विष्णु ने एकादशी तिथि पर अपने ही तेज से एक शक्ति प्रकट की, जिसने उसका अंत किया — वही एकादशी देवी के रूप में पूजी जाती हैं। श्रद्धा से यह व्रत रखने वाले के पाप शांत होते हैं, ऐसी मान्यता है।
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स्कंद पुराण में कथा आती है कि नारद जी ने भगवान विष्णु से पूछा — कलियुग में मनुष्य का दुख कैसे घटे। विष्णु ने सत्यनारायण पूजा बताई: कथा का पाठ और उपस्थित सब लोगों में प्रसाद। यह सरल विधान घर में समृद्धि लाता है और कष्ट दूर करता है, ऐसा माना जाता है।
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एक प्रचलित कथा में एक निर्धन ब्राह्मण विधवा और उसके पुत्र का वर्णन है। ऋषियों के कहने पर पुत्र ने प्रदोष काल यानी संध्या बेला में शिव का व्रत रखा, और उनके दिन फिर गए। यही वह समय है जब शिव कैलास पर आनंद तांडव करते हैं, ऐसा कहा जाता है।
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कथा माता पार्वती से जुड़ी है, जिन्होंने अपने कक्ष की रक्षा के लिए गणेश को रचा; शिव ने अनजाने में उनका शीश हर लिया और फिर हाथी का शीश लगाकर उन्हें जीवन दिया। संकष्टी का अर्थ है संकट से उद्धार — यह व्रत गणेश के उसी संकट और उसके समाधान का स्मरण है, और बाधाएँ हटाने के लिए रखा जाता है।
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पूर्णिमा का दिन परंपरा में सत्यनारायण कथा और लक्ष्मी पूजन से जुड़ा है। चंद्र देव और भगवान विष्णु — दोनों की कृपा एक साथ माँगने के लिए यह तिथि सबसे उपयुक्त मानी जाती है।
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अमावस्या, यानी चंद्रविहीन रात, परंपरा में पितरों के स्मरण की तिथि है। इस दिन तर्पण और श्राद्ध किए जाते हैं — विशेषकर मौनी अमावस्या और सोमवती अमावस्या, जब अमावस्या सोमवार को पड़ती है।
आगे की तिथियाँ देखें →कोई भी कैलकुलेटर जो नहीं बता सकता, वह आमने-सामने की बातचीत में मिल सकता है। अपने सवाल सीधे आचार्य के सामने रखें।